Tuesday, 18 December 2012

देखा था उस दिन . . .



मैंने देखा था उस दिन 
तुम्हारे उस रूप को ;
तुम्हारे चेहरे की चांदनी 
तुम्हारे बदन की धूप को ;
हैरां था मैं देख बहुत
कुदरत के उस बुत को ;
फ़लक पर दिख जाया करो 
ढलते  ही शाम . . ;
ये बात कहता है
"साहिल" सिर्फ आपको . . |

Friday, 14 December 2012

आज कल . .

आज कल चर्चे अपने भी हुआ करते है
दुश्मनो की महफ़िल में वो भी हुआ करते है |

ज़िक्र जिनका गवारा न करतें थे कभी ,
आज कल उनसे भी हँस कर मिला करते है |

वक्त  गुज़रा है जिनका समन्दर के तुफानो में ,
अब तो वो भी "साहिल" पर जाने से डरा करते है |

जो रोज़ ज़िक्र छेड़ा करतें थे अपने ख्वाबों का ,
आज कल वो भी रातो को जाग करते है |

जिनको नाज़ था बड़ा अपने हुसन पर ,
अब तो वो भी चन्दन लगाकर नहाया करते है |

हमने देखा है . . .


हमने देखा है उदासियों को उदास होते  हुए, 
किसी से रहते है दूर हम पास होते हुए |

अपनी हालत का जब से एहसास हुआ है,
तब से देखा है पत्थरों को भी  हमने रोते हुए |

जब कभी तेरी याद आती है "साहिल",
तब बिन बदल बरसात देखा है हमने होते हुए |

वो रखते है आरज़ू बहुत कुछ पाने की मगर,
बिना पाए देखा है हमने बहुत कुछ खोते हुए |

Thursday, 25 October 2012



दिल - -ज़ज्बात कह पाना है मुश्किल ,
दिल - - दर्द सह  पाना  है  मुश्किल  |

खोयी   रहती  हूँ  जो तेरे   ख्यालों   में ,
इन ख्यालों से निकल पाना है मुश्किल ;
दस्तूर - - दुनियां निभाना है मुश्किल-
मेरा  तुमसे  मिल  पाना   है   मुश्किल |

कितनी   गहराई   है   इस  प्यार   में,
इस  प्यार  को समझ पाना है मुश्किल;
 मिले तुम हमसे मिले  हम तुमसे-
तेरा मेरा मिलन अब हो पाना है मुश्किल |

कोशिश  करुँगी  की  तुझे  भूल जाऊं,
और  मिटा  दू यादें  अपने ज़हन  से ;
की   मिले  थे  हम  कभी   साहिल -
पर इस बात को भूल पाना है मुश्किल |

दिल - -ज़ज्बात कह पाना है मुश्किल ,
दिल - - दर्द सह  पाना  है  मुश्किल  |

Sunday, 26 August 2012

जब बर्बाद ही . . .

जब बर्बाद ही करना है ,
तो कुछ इस तरह से बर्बाद कर मुझे ,
की फिर कभी खुद को -
आबाद न कर सकूँ . . . 
और छोड़ जा अपनी बेवफाई का ,
कुछ एसा रंग "साहिल" -
की चाहकर भी अंपनी जिंदगी को ;
बेदाग न कर सकूँ . . . .|

Sunday, 12 August 2012

दिल-ए-ज़ज्बात . . . मुश्किल


दिल-ए-ज़ज्बात      जो   बयाँ   करोगी ,
ज़ुबां   से   तो   होगी     ही     मुश्किल ;
दिल-ए-दर्द     को     दर्द      समझोगी -
तो    सहने   में    होगी    ही  मुश्किल |

जो रहती हो खोयी किसी के तसव्वुर में ,
तो  इन ख्यालो से  से होगी ही मुश्किल ;
जो  तोड़  दो  तुम ये  ख्याल-ए- बंदिश -
तो   सामने    होगा   तुम्हारा    साहिल |

तुम  ये  कहती  हो की  मिलन हमारा , 
है    इस   ज़हां  में   होना    मुश्किल ;
दो कदम जो  बढाओ  तुम  इस तरफ -
तो   कुछ    भी   नही   है     मुश्किल |

इस       प्यार      को   समझाना     है ,
न  इतना   आसन,  न   है   मुश्किल ;
जो     चाहती    हो    इसे    समझना -
तो    मिला    लो    साहिल   से   दिल |

तुम्हारी   कोशिश   है  मुझे भूलने  की ,
ये     काम       बहुत     है      मुश्किल ;
क्योंकि    निगाहे  जो   बंद भी  कर लो -
तो  सामने  होगा  तुम्हारा  ही  साहिल |

Thursday, 12 July 2012

मेरी कलम से . . . .

 
(1)


साहिल की तमन्ना थी उस मुसाफिर  की तरह,
जिसे मजिल तो न मिली मगर हमसफ़र मिल गया |

(2)

 
दरिया के आस पास, रेत पर थे कुछ निशान,
याद दिलाते है किसी  की, जो है किसी की पहचान |

 
(3)

मेरी बरबादियो में ज़िक्र तेरा भी होता है ;
जब   कोई  मेरी  जैसी  ही  ख़ता करता है,
हूँ,  खुशनशीब  की मेरा ज़िक्र आज  भी-
तेरे  नाम   के   साथ  हुआ  करता  है |


(4)

मौसम भी बदलने में वक्त लिया करते हैं ;
मगर वक्त  के बदलने का कोई मौसम नहीं होता,
बीमार का हाल तो पूछने सभी जाते है साहिल-
मगर उसके दर्द का एहसास हर किसी को नही होता |


(5)


तेरी तनहाई को जब किसी का सहारा न मिले
तेरी डूबती किस्ती को जब कोई किनारा न मिले
तब मेरे प्यार को याद करके बहा लेना दो आंसू
चाहे हमारा निशान इस जहाँ में मिले न मिले |

 
(6)

चाह कर भी  कभी - कभी ये कदम बढ़ाये  नही जाते
और कुछ ज़ख़्म देखने वालो से  छुपाये नही जाते |

(7)

हालत ऐसे भी नही है की,
मै मुस्कुरा भी न सकू,
मेरे दर्द-ए-दिल की तू दावा है -
मगर तेरे पास मै आ भी न सकू |


(8)

तेरे पास चला आया हूँ मै,
ज़रा और मुस्कुराने के लिए,
कुछ ज़ख्म जो अभी हरे है-
उन्हें ज़माने से छुपाने के लिए |


(9)

काश ऐसा कोई सफ़र होता,
की हर मोड़ पर तेरा ही घर होता,
मै मंजिलो की फिर तमन्ना न करता-
अगर तेरे जैसा कोई हमसफ़र  होता |


(10)


मेरी बरबादियों पर मुस्कुराने वालों,
तुम  बे खबर हो,  ये दिल भी  हंसा  करता था;
विरानो की तमन्ना हमेशा से नहीं थी साहिल को-
आशियाना   एक   इसका भी   यहाँ   हुआ करता था |


Saturday, 10 March 2012

मेरी पहली मुहब्बत . . .

मेरी  पहली  मुहब्बत   हो  तुम,
मेरे  जीने  की  जरुरत हो तुम ;
कल   तक  जो  ख्वाब  थे  मेरे -
आज  वो   हकीकत  हो  तुम |

मेर   ख्वाबो   में  एक  तस्वीर  थी  ,
उससे कहीं बढकर खुबसूरत हो तुम ;
गुनगुनाता  रहा हरपल जिसको मै -
मेरी वो  दिलकश  ग़ज़ल  हो  तुम  |

मै  अब  तलक  महसूस  करता हूँ ,
मेरा   वो    एहसास  हो      तुम ;
दिल को समझाया मैने बहुत, मगर -
इसके  धडकने  का  बहाना  हो तुम |

मै  सदियो  से  तराशता  रहा  जिसे , 
वो  मुहब्बत   की  मूरत  हो  तुम ;
मेरे   जीने  की  जरुरत  हो   तुम -
मेरी   पहली   मुहब्बत  हो   तुम |

Sunday, 4 March 2012

नारी तुम तो तुम हो ...

कोई समझा न पाया तुम्हे,
तुम रहस्मयी ऐसी वो पहेली हो,
किसी को मिटा दिया -
या मिट गया ;
तुम नर की ऐसी सहेली हो |

यह तो सभी कहती है 
की नारी तो अबला है , गर 
मेरी नज़र से देखो - 
जो उपसर्ग हटा कर , 
नारी तो एक बला है |

इस पृथ्वी पर न जाने 
कितने तुम्हारे रूप है,
सभी ढंग में हर रंग में 
बहुत अच्छे तुम्हारे स्वरूप है | 

दो का आकड़ा भी पड़ता न भरी, 
इनके पैरो में झुकी दुनिया सारी,
नारी तुम तो तुम हो बस तुम;
पहचान न पाया साहिल मगर हो गया गुम |