कोई समझा न पाया तुम्हे,
तुम रहस्मयी ऐसी वो पहेली हो,
किसी को मिटा दिया -
या मिट गया ;
तुम नर की ऐसी सहेली हो |
यह तो सभी कहती है
की नारी तो अबला है , गर
मेरी नज़र से देखो -
जो उपसर्ग हटा कर ,
नारी तो एक बला है |
इस पृथ्वी पर न जाने
कितने तुम्हारे रूप है,
सभी ढंग में हर रंग में
बहुत अच्छे तुम्हारे स्वरूप है |
दो का आकड़ा भी पड़ता न भरी,
इनके पैरो में झुकी दुनिया सारी,
नारी तुम तो तुम हो बस तुम;
पहचान न पाया साहिल मगर हो गया गुम |
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