Saturday, 16 July 2011

दिल की हर बात हो पूरी ये जरुरी तो नहीं

दिल की हर बात हो पूरी ये जरुरी तो नहीं
दिल जो भी चाहे वो सब मिल जाये ये जरुरी तो नहीं | 

इन्सान देखता है न जाने ख्वाब कितने
हर ख्वाब हो जाये हकीकत ये जरुरी तो नहीं |

मै तेरी बज़्म में नहीं आया था मगर
ये महफ़िल थी हर किसी के लिए ये जरुरी तो नहीं |

आसन है कहना की खुश रहते हो दूर होकर
जहाँ में तुम ही रहो खुश ये जरुरी तो नहीं |

गम की आंधियां चले तो चले मेरे आशियाने की तरफ
और घर तुम्हारा बच जाये साहिल ये जरुरी तो नहीं |

दिल की हर बात हो पूरी ये जरुरी तो नहीं
दिल जो भी चाहे वो सब मिल जाये ये जरुरी तो नहीं |

Wednesday, 25 May 2011

तुम से मुहबत करके . . .

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |
जो आईना  देखूं  तो ख़ुदा की कसम ;
अपनी ही सूरत देख डरती हूँ |

तुम से हो न कभी मुलाकात ,
ये ख़ुदा से दिन-रात दुआ करती हूँ |
तुम गैरों की क्या बात करते हो साहिल ;
मै तो अब अपनो से भी दूर रहती हूँ |

जो गुनाह न किये कभी मैंने ,
आज उनकी भी सजा पाती  हूँ |
तुम को ज़माने में रुसवा न होने दिया ;
सरे सितम चुपके चुपके सहती हूँ |


तुमने  जो पूछ लिया यूही,
याद है तुमे वो कसमे वो वादे |
नही है याद में सर हिलाया मगर ;
तुम्हे क्या बताऊँ मै कैसे भूल सकती हूँ |

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |

Friday, 20 May 2011

अगर देखना हो परेशां मुझे . . . . .


अगर देखना हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |


मुझको जो कह दिया तुमने पत्थर,
छू कर मेरी रूह को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
मेरी खोमोश निगाहों में डूब कर देखो |


चेहरे पर मेरे आई उदासी क्यों है,
ये बात अपने दिल से पूछ कर देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
एक बार हम से मिल कर देखो |


वसल का दिन तो ढल गया साहिल,
हिज़्रर की  शब काट कर देखो,
अगर देखना  हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,



रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |