Friday, 20 May 2011

अगर देखना हो परेशां मुझे . . . . .


अगर देखना हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |


मुझको जो कह दिया तुमने पत्थर,
छू कर मेरी रूह को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
मेरी खोमोश निगाहों में डूब कर देखो |


चेहरे पर मेरे आई उदासी क्यों है,
ये बात अपने दिल से पूछ कर देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
एक बार हम से मिल कर देखो |


वसल का दिन तो ढल गया साहिल,
हिज़्रर की  शब काट कर देखो,
अगर देखना  हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,



रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |

1 comment:

  1. gud sahil ab tum dheere dheere sikh rhe ho..........keept it up.

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