Wednesday, 25 May 2011

तुम से मुहबत करके . . .

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |
जो आईना  देखूं  तो ख़ुदा की कसम ;
अपनी ही सूरत देख डरती हूँ |

तुम से हो न कभी मुलाकात ,
ये ख़ुदा से दिन-रात दुआ करती हूँ |
तुम गैरों की क्या बात करते हो साहिल ;
मै तो अब अपनो से भी दूर रहती हूँ |

जो गुनाह न किये कभी मैंने ,
आज उनकी भी सजा पाती  हूँ |
तुम को ज़माने में रुसवा न होने दिया ;
सरे सितम चुपके चुपके सहती हूँ |


तुमने  जो पूछ लिया यूही,
याद है तुमे वो कसमे वो वादे |
नही है याद में सर हिलाया मगर ;
तुम्हे क्या बताऊँ मै कैसे भूल सकती हूँ |

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |

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