Wednesday, 25 May 2011

तुम से मुहबत करके . . .

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |
जो आईना  देखूं  तो ख़ुदा की कसम ;
अपनी ही सूरत देख डरती हूँ |

तुम से हो न कभी मुलाकात ,
ये ख़ुदा से दिन-रात दुआ करती हूँ |
तुम गैरों की क्या बात करते हो साहिल ;
मै तो अब अपनो से भी दूर रहती हूँ |

जो गुनाह न किये कभी मैंने ,
आज उनकी भी सजा पाती  हूँ |
तुम को ज़माने में रुसवा न होने दिया ;
सरे सितम चुपके चुपके सहती हूँ |


तुमने  जो पूछ लिया यूही,
याद है तुमे वो कसमे वो वादे |
नही है याद में सर हिलाया मगर ;
तुम्हे क्या बताऊँ मै कैसे भूल सकती हूँ |

तुम से मुहबत करके,
न मै जीती हूँ न मै मरती हूँ |

Friday, 20 May 2011

अगर देखना हो परेशां मुझे . . . . .


अगर देखना हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |


मुझको जो कह दिया तुमने पत्थर,
छू कर मेरी रूह को देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
मेरी खोमोश निगाहों में डूब कर देखो |


चेहरे पर मेरे आई उदासी क्यों है,
ये बात अपने दिल से पूछ कर देखो,
रफ्ता - रफ्ता बढाकर कदम-
एक बार हम से मिल कर देखो |


वसल का दिन तो ढल गया साहिल,
हिज़्रर की  शब काट कर देखो,
अगर देखना  हो परेशां मुझे,
तो आकर मेरे घर को देखो,



रफ्ता - रफ्ता बढाकर  कदम-
मेरे घर की दर-ओं-दिवार को देखो |