Saturday, 10 March 2012

मेरी पहली मुहब्बत . . .

मेरी  पहली  मुहब्बत   हो  तुम,
मेरे  जीने  की  जरुरत हो तुम ;
कल   तक  जो  ख्वाब  थे  मेरे -
आज  वो   हकीकत  हो  तुम |

मेर   ख्वाबो   में  एक  तस्वीर  थी  ,
उससे कहीं बढकर खुबसूरत हो तुम ;
गुनगुनाता  रहा हरपल जिसको मै -
मेरी वो  दिलकश  ग़ज़ल  हो  तुम  |

मै  अब  तलक  महसूस  करता हूँ ,
मेरा   वो    एहसास  हो      तुम ;
दिल को समझाया मैने बहुत, मगर -
इसके  धडकने  का  बहाना  हो तुम |

मै  सदियो  से  तराशता  रहा  जिसे , 
वो  मुहब्बत   की  मूरत  हो  तुम ;
मेरे   जीने  की  जरुरत  हो   तुम -
मेरी   पहली   मुहब्बत  हो   तुम |

Sunday, 4 March 2012

नारी तुम तो तुम हो ...

कोई समझा न पाया तुम्हे,
तुम रहस्मयी ऐसी वो पहेली हो,
किसी को मिटा दिया -
या मिट गया ;
तुम नर की ऐसी सहेली हो |

यह तो सभी कहती है 
की नारी तो अबला है , गर 
मेरी नज़र से देखो - 
जो उपसर्ग हटा कर , 
नारी तो एक बला है |

इस पृथ्वी पर न जाने 
कितने तुम्हारे रूप है,
सभी ढंग में हर रंग में 
बहुत अच्छे तुम्हारे स्वरूप है | 

दो का आकड़ा भी पड़ता न भरी, 
इनके पैरो में झुकी दुनिया सारी,
नारी तुम तो तुम हो बस तुम;
पहचान न पाया साहिल मगर हो गया गुम |