Tuesday, 18 December 2012
Friday, 14 December 2012
आज कल . .
आज कल चर्चे अपने भी हुआ करते है
दुश्मनो की महफ़िल में वो भी हुआ करते है |
ज़िक्र जिनका गवारा न करतें थे कभी ,
आज कल उनसे भी हँस कर मिला करते है |
वक्त गुज़रा है जिनका समन्दर के तुफानो में ,
अब तो वो भी "साहिल" पर जाने से डरा करते है |
जो रोज़ ज़िक्र छेड़ा करतें थे अपने ख्वाबों का ,
आज कल वो भी रातो को जाग करते है |
जिनको नाज़ था बड़ा अपने हुसन पर ,
अब तो वो भी चन्दन लगाकर नहाया करते है |
हमने देखा है . . .
हमने देखा है उदासियों को उदास होते हुए,
किसी से रहते है दूर हम पास होते हुए |
अपनी हालत का जब से एहसास हुआ है,
तब से देखा है पत्थरों को भी हमने रोते हुए |
जब कभी तेरी याद आती है "साहिल",
तब बिन बदल बरसात देखा है हमने होते हुए |
वो रखते है आरज़ू बहुत कुछ पाने की मगर,
बिना पाए देखा है हमने बहुत कुछ खोते हुए |
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