Thursday, 12 July 2012

मेरी कलम से . . . .

 
(1)


साहिल की तमन्ना थी उस मुसाफिर  की तरह,
जिसे मजिल तो न मिली मगर हमसफ़र मिल गया |

(2)

 
दरिया के आस पास, रेत पर थे कुछ निशान,
याद दिलाते है किसी  की, जो है किसी की पहचान |

 
(3)

मेरी बरबादियो में ज़िक्र तेरा भी होता है ;
जब   कोई  मेरी  जैसी  ही  ख़ता करता है,
हूँ,  खुशनशीब  की मेरा ज़िक्र आज  भी-
तेरे  नाम   के   साथ  हुआ  करता  है |


(4)

मौसम भी बदलने में वक्त लिया करते हैं ;
मगर वक्त  के बदलने का कोई मौसम नहीं होता,
बीमार का हाल तो पूछने सभी जाते है साहिल-
मगर उसके दर्द का एहसास हर किसी को नही होता |


(5)


तेरी तनहाई को जब किसी का सहारा न मिले
तेरी डूबती किस्ती को जब कोई किनारा न मिले
तब मेरे प्यार को याद करके बहा लेना दो आंसू
चाहे हमारा निशान इस जहाँ में मिले न मिले |

 
(6)

चाह कर भी  कभी - कभी ये कदम बढ़ाये  नही जाते
और कुछ ज़ख़्म देखने वालो से  छुपाये नही जाते |

(7)

हालत ऐसे भी नही है की,
मै मुस्कुरा भी न सकू,
मेरे दर्द-ए-दिल की तू दावा है -
मगर तेरे पास मै आ भी न सकू |


(8)

तेरे पास चला आया हूँ मै,
ज़रा और मुस्कुराने के लिए,
कुछ ज़ख्म जो अभी हरे है-
उन्हें ज़माने से छुपाने के लिए |


(9)

काश ऐसा कोई सफ़र होता,
की हर मोड़ पर तेरा ही घर होता,
मै मंजिलो की फिर तमन्ना न करता-
अगर तेरे जैसा कोई हमसफ़र  होता |


(10)


मेरी बरबादियों पर मुस्कुराने वालों,
तुम  बे खबर हो,  ये दिल भी  हंसा  करता था;
विरानो की तमन्ना हमेशा से नहीं थी साहिल को-
आशियाना   एक   इसका भी   यहाँ   हुआ करता था |


2 comments:

  1. वाह...
    बहुत बहुत सुन्दर.....
    कोमल एहसास...
    अनु

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    1. हौसला अफज़ाई के लिए शुक्रिया . . .!!!

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